<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3704081507814008687</id><updated>2012-02-16T19:13:11.289-08:00</updated><category term='साग़र साहेब'/><title type='text'>ग़ज़ल</title><subtitle type='html'>एक प्रयास..</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://dwijandghazal.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3704081507814008687/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dwijandghazal.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>द्विजेन्द्र ‘द्विज’</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16379129109381376790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://bp0.blogger.com/_8Gu4F-EdIh0/SD119gdj7mI/AAAAAAAAAAU/cXxdkAh97pI/S220/Dwij.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>4</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3704081507814008687.post-3514016496799118358</id><published>2008-06-25T05:42:00.001-07:00</published><updated>2008-06-26T02:19:50.363-07:00</updated><title type='text'>साग़र साहेब</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNERI2JbJI/AAAAAAAAACU/HvJET-IPUQg/s1600-h/spp.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNERI2JbJI/AAAAAAAAACU/HvJET-IPUQg/s320/spp.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5216087854648224914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मनोहर शर्मा ‘साग़र’ पालमपुरी&lt;br /&gt;(25 जनवरी, 1929 — 30 अप्रैल, 1996)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परिचय&lt;br /&gt;नाम: मनोहर शर्मा&lt;br /&gt;उपनाम: ’साग़र’ पालमपुरी&lt;br /&gt;जन्म : 25 जनवरी,1929&lt;br /&gt;जन्मस्थान : गाँव झुनमान सिंह , तहसील शकरगढ़ (अब पाकिस्तान)&lt;br /&gt;निधन : 30 अप्रैल,1996, स्थाई निवास , अशोक लाज , मारण्डा—पालमपुर (हिमाचल प्रदेश)&lt;br /&gt;रचनाओं के लिए संपर्क सूत्र : द्विजेन्द्र ‘द्विज’ &lt;a href="mailto:dwij.ghazal@gmail.com"&gt;dwij.ghazal@gmail.com&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;****&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNeDr-PuuI/AAAAAAAAADU/O9d46uydiak/s1600-h/26Castle-m71.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNeDr-PuuI/AAAAAAAAADU/O9d46uydiak/s200/26Castle-m71.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5216116210861587170" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१.&lt;br /&gt;अपने ही परिवेश से अंजान है&lt;br /&gt;कितना बेसुध आज का इन्सान है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर डगर मिलते हैं बेचेहरा—से लोग&lt;br /&gt;अपनी सूरत की किसे पहचान है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भावना को मौन का पहनाओ अर्थ&lt;br /&gt;मन की कहने में बड़ा नुकसान है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाँद पर शायद मिले ताज़ा हवा&lt;br /&gt;क्योंकि आबादी यहाँ गुंजान है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कामनाओं के वनों में हिरण—सा&lt;br /&gt;यह भटकता मन  चलायेमान है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाव मन की कौन —से तट पर थमे&lt;br /&gt;हर तरफ़ यादों का इक तूफ़ान है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आओ चलकर जंगलों में जा बसें&lt;br /&gt;शह्र की तो हर गली वीरान है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साँस का चलना ही जीवन तो नहीं&lt;br /&gt;सोच बिन हर आदमी बेजान है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खून से ‘साग़र’! लिखेंगे हम ग़ज़ल&lt;br /&gt;जान में जब तक हमारी जान है.&lt;br /&gt;(सारिका)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNdvcgnByI/AAAAAAAAADE/qJAJEyLCjs4/s1600-h/13.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://2.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNdvcgnByI/AAAAAAAAADE/qJAJEyLCjs4/s200/13.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5216115863113369378" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जंगल है महव—ए— ख़्वाब हवा में नमी —सी है&lt;br /&gt;पेड़ों पे       गुनगुनाती हुई   ख़ामुशी —सी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चट्टान है वो   जिसको     सुनाई न दे सके&lt;br /&gt;झरनों के  शोर  में जो  मधुर रागिनी सी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उड़कर जो उसके गाँव से आती है सुबह—ओ—शाम&lt;br /&gt;उस धूल में भी यारो महक फूल की— सी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगता है हो गया है शुरू चाँद का सफ़र&lt;br /&gt;आँचल पे धौलाधार के कुछ चाँदनी —सी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओढ़े हुए हैं बर्फ़ की चादर तो क्या हुआ&lt;br /&gt;इन पर्वतों के पीछे कहीं रौशनी —सी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काँटों से दिल को कोई गिला इसलिए नहीं&lt;br /&gt;रोज़—ए—अज़ल से इसमें ख़लिश दायिमी —सी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैं कितने बेनियाज़ बहार—ओ—ख़िज़ाँ से हम&lt;br /&gt;य्ह ज़िन्दगी हमारे लिए दिल्लगी —सी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साग़र ग़मों की धूप ने झुलसा दिया हमें&lt;br /&gt;फिर भी दिल—ओ—नज़र में अजब ताज़गी—सी है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३. &lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNeU8aDc1I/AAAAAAAAADc/eS1fZJHuhiM/s1600-h/28.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNeU8aDc1I/AAAAAAAAADc/eS1fZJHuhiM/s200/28.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5216116507330966354" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ंजर—ब—क़फ़ है साक़ी तो साग़र लहू—लहू&lt;br /&gt;है सारे मयकदे  ही का मंज़र लहू—लहू &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद किया है चाँद ने  इक़दाम—ए—ख़ुदकुशी&lt;br /&gt;पुरकैफ़  चाँदनी की है  चादर लहू—लहू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर—सू दयार—ए—ज़ेह्न में ज़ख़्मों के हैं गुलाब&lt;br /&gt;है आज फ़स्ल—ए—गुल का तसव्वुर लहू—लहू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अहले—जफ़ा तो महव थे ऐशो—निशात में&lt;br /&gt;होते रहे ख़ुलूस के पैक़र लहू—लहू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाया है रंग ख़ून किसी बेक़ुसूर का&lt;br /&gt;देखी है हमने चश्म—ए—सितमगर लहू—लहू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डूबी हैं इसमे मेह्र—ओ—मरव्वत की कश्तियाँ&lt;br /&gt;है इसलिए हवस का समंदर लहू—लहू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या फिर किया गया है कोई क़ैस संगसार?&lt;br /&gt;वीरान रास्तों के हैं पत्थर लहू—लहू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘साग़र’!सियाह रात की आगोश के लिए&lt;br /&gt;सूरज तड़प रहा है उफ़क़ पर लहू—लहू.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNd6lv_JeI/AAAAAAAAADM/_pOQAhtHziU/s1600-h/18.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNd6lv_JeI/AAAAAAAAADM/_pOQAhtHziU/s200/18.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5216116054572344802" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खा गया वक्त हमें नर्म निवालों की तरह&lt;br /&gt;हसरतें हम पे हसीं ज़ोहरा—जमालों की तरह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रूह की झील में चाहत के कँवल खिलते हैं&lt;br /&gt;किसी बैरागी के पाक़ीज़ा ख़यालों की तरह &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थे कभी दिल की जो हर एक तमन्ना का जवाब&lt;br /&gt;आज क्यों ज़ेह्न में उतरे हैं सवालों की तरह ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साथ उनके तो हुआ लम्हों में सालों का गुज़र&lt;br /&gt;उनसे बिछुड़े तो लगे लम्हे भी सालों की तरह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़ख़्म तलवार के गहरे भी हों भर जाते हैं&lt;br /&gt;लफ़्ज़ तो दिल में उतर जाते हैं भालों की तरह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम समझते रहे कल तक जिन्हें रहबर अपने&lt;br /&gt;पथ से भटके वही आवारा  ख़्यालों की तरह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनको कमज़ोर न समझो कि किसी रोज़ ये लोग&lt;br /&gt;मोड़ देंगे इसी शमशीर को ढालों की तरह &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फूल को शूल समझते हैं ये दुनिया वाले&lt;br /&gt;बीते इतिहास के विपरीत हवालों की तरह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आफ़रीं उनपे जो तौक़ीर—ए—वतन की ख़ातिर&lt;br /&gt;दार पर झूल गए झूलने वालों की तरह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम भरी भीड़ में हैं आज भी तन्हा—तन्हा&lt;br /&gt;अह्द—ए—पारीना के वीरान शिवालों की तरह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़म से ना—आशना इंसान का जीना है फ़ज़ूल&lt;br /&gt;ज़ीस्त से लिपटे हैं ग़म पाँवों के छालों की तरह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब कन्हैया है न हैं गोपियाँ ब्रज में ‘साग़र’!&lt;br /&gt;हम हैं फ़ुर्क़तज़दा मथुरा के गवालों की तरह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3704081507814008687-3514016496799118358?l=dwijandghazal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dwijandghazal.blogspot.com/feeds/3514016496799118358/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3704081507814008687&amp;postID=3514016496799118358' title='26 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3704081507814008687/posts/default/3514016496799118358'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3704081507814008687/posts/default/3514016496799118358'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dwijandghazal.blogspot.com/2008/06/blog-post_542.html' title='साग़र साहेब'/><author><name>द्विजेन्द्र ‘द्विज’</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16379129109381376790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://bp0.blogger.com/_8Gu4F-EdIh0/SD119gdj7mI/AAAAAAAAAAU/cXxdkAh97pI/S220/Dwij.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNERI2JbJI/AAAAAAAAACU/HvJET-IPUQg/s72-c/spp.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>26</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3704081507814008687.post-3860073605504776336</id><published>2008-06-25T04:31:00.000-07:00</published><updated>2008-07-07T03:21:04.478-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साग़र साहेब'/><title type='text'>कुछ और ग़ज़लें...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNz8nWFgZI/AAAAAAAAAE0/mXJkqNL_mfE/s1600-h/p2.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNz8nWFgZI/AAAAAAAAAE0/mXJkqNL_mfE/s200/p2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5216140278616129938" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१४.&lt;br /&gt;है कितनी तेज़ मेरे ग़मनवाज़ मन की आँच&lt;br /&gt;हो जिस तरह किसी तपते हुए गगन की आँच&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ से कूच करूँ तो यही तमन्ना है&lt;br /&gt;मेरी चिता को जलाए ग़म—ए—वतन की आँच&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहाँ से आए ग़ज़ल में सुरूर—ओ—सोज़ो—गुदाज़?&lt;br /&gt;हुई है माँद चराग़—ए—शऊर—ए—फ़न की आँच&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उदास रूहों में जीने की आरज़ू भर दे&lt;br /&gt;लतीफ़ इतनी है ‘साग़र’! मेरे सुख़न की आँच.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१५.&lt;br /&gt;छोड़े हुए गो उसको हुए है बरस कई&lt;br /&gt;लेकिन वो अपने गाँव को भूला नहीं अभी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो मदरिसे,वो बाग़, वो गलियाँ ,वो रास्ते&lt;br /&gt;मंज़र वो उसके ज़ेह्न पे हैं नक़्श आज भी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिलते थे भाई भाई से, इक—दूसरे से लोग&lt;br /&gt;होली की धूम— धाम हो या ईद की ख़ुशी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मज़हब का था सवाल न थी ज़ात की तमीज़&lt;br /&gt;मिल—जुल के इत्तिफ़ाक से कटती थी ज़िन्दगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाया था शहर में उसे रोज़ी का मसअला&lt;br /&gt;फिर बन के रह गया वही ज़ंजीर पाँओं की&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है कितनी बेलिहाज़ फ़िज़ा शह्र की जहाँ&lt;br /&gt;ना—आशना हैं दोस्त तो हमसाये अजनबी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माना हज़ारों खेल तमाशे हैं शह्र में&lt;br /&gt;‘साग़र’! है अपने गाँव की कुछ बात और ही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNzvy-CixI/AAAAAAAAAEs/BIBwlNZZP4A/s1600-h/p1.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://3.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNzvy-CixI/AAAAAAAAAEs/BIBwlNZZP4A/s200/p1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5216140058398198546" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१६.&lt;br /&gt;ख़िज़ाँ के दौर में हंगामा—ए—बहार थे हम&lt;br /&gt;ख़ुलूस—ओ—प्यार के मौसम की यादगार थे हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चमन को तोड़ने वाले ही आज कहते हैं&lt;br /&gt;वो गुलनवाज़ हैं ग़ारतगर—ए—बहार थे हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शजर से शाख़ थी तो फूल शाख़ से नालाँ&lt;br /&gt;चमन के हाल—ए—परेशाँ पे सोगवार थे हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें तो जीते —जी उसका कहीं निशाँ न मिला&lt;br /&gt;वो सुब्ह जिसके लिए महव—ए—इंतज़ार थे हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुई न उनको ही जुर्रत कि आज़माते हमें&lt;br /&gt;वग़र्ना जाँ से गुज़रने को भी तैयार थे हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो लुट गए सर—ए—महफ़िल तो क्या हुआ ‘साग़र’!&lt;br /&gt;अज़ल से जुर्म—ए—वफ़ा के गुनाहगार थे हम.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१७.&lt;br /&gt;अपनी मंज़िल से कहीं दूर नज़र आता है&lt;br /&gt;जब मुसाफ़िर कोई मजबूर नज़र आता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घुट के मर जाऊँ मगर तुझ पे न इल्ज़ाम धरूँ&lt;br /&gt;मेरी क़िस्मत को ये मंज़ूर नज़र आता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज तक मैंने उसे दिल में छुपाए रक्खा&lt;br /&gt;ग़म—ए—दुनिया मेरा मश्कूर नज़र आता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है करिश्मा ये तेरी नज़र—ए—करम का शायद&lt;br /&gt;ज़र्रे—ज़र्रे में मुझे नूर नज़र आता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी मौहूम निगाहों में उतर कर देखो&lt;br /&gt;उनमें इक ज़लज़ला मस्तूर नज़र आता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेल ही खेल में खाया था जो इक  दिन मैंने &lt;br /&gt;ज़ख़्म ‘साग़र’! वही नासूर नज़र आता है .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१८.&lt;br /&gt;बेसहारों के मददगार हैं हम&lt;br /&gt;ज़िंदगी ! तेरे तलबगार हैं हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेत के महल गिराने वालो&lt;br /&gt;जान लो आहनी दीवार हैं हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तोड़ कर कोहना रिवायात का जाल&lt;br /&gt;आदमीयत के तरफ़दार हैं हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फूल हैं अम्न की राहों के लिए&lt;br /&gt;ज़ुल्म के वास्ते तलवार हैं हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बे—वफ़ा ही सही हमदम अपने&lt;br /&gt;लोग कहते हैं वफ़ादार हैं  हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस्म को तोड़ कर जो मिल जाए&lt;br /&gt;ख़ुश्क रोटी के रवादार हैं हम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अम्न—ओ—इन्साफ़ हो जिसमें ‘साग़र’!&lt;br /&gt;उस फ़साने के परस्तार हैं हम.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१९.&lt;br /&gt;कितना यहाँ के लोगों में है प्यार देखना&lt;br /&gt;इन वादियों में आ के तो इक बार देखना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देते हैं किस क़दर ये दिलो—ओ—रूह को सुकून&lt;br /&gt;खिड़की  से चमकते हुए कोहसार देखना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बरसात खत्म हो गई लो धान पक गए &lt;br /&gt;आया है फिर से ‘सैर’ का त्योहार देखना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर रहगुज़र पे सुर्ख़ गुलाबों का है हुजूम&lt;br /&gt;मेरे वतन के महकते गुलज़ार देखना&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;बजता है बावली पे गगरियों का जलतरंग&lt;br /&gt;चंचल हवाएँ  गाती हैं मल्हार देखना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सदियों पुराने चित्र ये कितने सजीव हैं&lt;br /&gt;महलों के गिर चुके दर—ओ—दीवार देखना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रुत फागुनी है राहों में फिर खिल उठे गुलाब&lt;br /&gt;मेलों में अप्सराओं के सिंगार देखना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐ काश! वो भी उतरें समन्दर में एक बार&lt;br /&gt;आता है जिनको तट से ही मंझधार देखना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो दोस्तों पे जान छिड़कता है किस तरह&lt;br /&gt;‘साग़र’ को आ़ज़मा के मेरे यार देखना.&lt;br /&gt;२०.&lt;br /&gt;एक वो तेरी याद का लम्हा झोंका था पुरवाई का&lt;br /&gt;टूट के नयनों से बरसा है सावन तेरी जुदाई का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तट ही से जो देख रहा है लहरों का उठना गिरना&lt;br /&gt;उसको अन्दाज़ा ही क्या है सागर की गहराई का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी—आस की धू्प सुनहरी, मायूसी की धुंध कभी&lt;br /&gt;लगता है जीवन हो जैसे ख़्वाब किसी सौदाई का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंगारों के शहर में आकर मेरी बेहिस आँखों को&lt;br /&gt;होता है एहसास कहाँ अब फूलों की राअनाई का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबहें निकलीं,शामें गुज़रीं, कितनी रातें बीत गईं&lt;br /&gt;‘साग़र’! फिर भी चाट रहा है ज़ह्र हमें तन्हाई का.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२१.&lt;br /&gt;दरअस्ल सबसे आगे जो दंगाइयों में था &lt;br /&gt;तफ़्तीश जब हुई तो तमाशाइयों में था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमला हुआ था जिनपे वही हथकड़ी में थे&lt;br /&gt;मुजरिम तो हाक़िमों के शनासाइयों में था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस दिन किसी अमीर के घर में था कोई जश्न&lt;br /&gt;बेरब्त एक शोर—सा शहनाइयों में था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैराँ हूँ मेरे क़त्ल की साज़िश में था शरीक़&lt;br /&gt;वो शख़्स जो कभी मेरे शैदाइयों में था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शोहरत की इन्तिहा में भी आया न था कभी&lt;br /&gt;‘साग़र’!वो लुत्फ़ जो मेरी रुस्वाइयों में था.&lt;br /&gt;२२.&lt;br /&gt;कैसा मेरे शऊर ने धोका दिया मुझे&lt;br /&gt;फिर ख़्वाहिशों के जाल में उलझा दिया मुझे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझ को हिसार—ए—ज़ात से ख़ुद ही निकाल कर&lt;br /&gt;इक हुस्न—ए—दिल फ़रेब ने ठुकरा दिया मुझे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नींद आ गई मुझे कभी काँटों की सेज पर&lt;br /&gt;फूलों के लम्स ने कभी तड़पा दिया मुझे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इक संग—ए—मील—सा था मगर कामनाओं ने&lt;br /&gt;रुसवाइयों के जाल में उलझा दिया मुझे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुमनामियों की गर्द में खोया हुआ था मैं&lt;br /&gt;तेरे बदन के क़र्ब ने चमका दिया मुझे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘साग़र’! वफ़ा की तुंद हवाओं ने आख़िरश&lt;br /&gt;अर्ज़—ओ—समा में धूल—सा बिखरा दिया मुझे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२३.&lt;br /&gt;गई   हैं रूठ कर जाने कहाँ वो  चाँदनी     रातें&lt;br /&gt;हुआ करती थीं तुम से जब वो पनघट पर मुलाक़ातें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये बोझल पल जुदाई के ये फ़ुरक़त की स्याह रातें&lt;br /&gt;महब्बत में मुक़द्दर ने हमें दी हैं ये सौग़ातें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुरानी  बात है लेकिन  तुम्हें भी याद हो शायद&lt;br /&gt;बहारों के  सुनहरे पल  महब्बत की हसीं रातें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूँ ही रूठी रहोगी हम से अय जान—ए—ग़ज़ल कब तक&lt;br /&gt;हक़ीक़त कब बनेंगी तुम से सपनों की मुलाक़ातें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं वो सहरा हूँ ‘साग़र’! जिस पे बिन बरसे गए बादल&lt;br /&gt;न जाने किस समंदर पर हुई हैं अब वो बरसातें. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२४.&lt;br /&gt;हर सम्त एक भीड़ —से फ़ैले हुए हैं लोग&lt;br /&gt;लगता है जैसे टूट के बिखरे हुए हैं लोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते नहीं अगर्चे किसी से ये दिल की बात&lt;br /&gt;हर गाम इश्तहार—से चिपके हुए हैं लोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैं खुद से दूर ग़ैरों को अपनाएँ किस तरह ?&lt;br /&gt;कुछ ऐसे अपने—आप से रूठे हुए हैं लोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये जानते हुए भी कि लुट जाएँगे वहाँ &lt;br /&gt;फिर भी उसी सराए में ठहरे हुए हैं लोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेचेहरगी ने उनको बनाया है ख़ुदपरस्त&lt;br /&gt;इन्सानियत की राह से भटके हुए हैं लोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुद्दत हुई गिरे थे यही आसमान से&lt;br /&gt;और आज भी खजूर पर अटके हुए हैं लोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मालूम क्या है राज़—ए—वजूद—ओ—अदम इन्हें&lt;br /&gt;अपनी अना के शोर में बहरे हुए हैं लोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चेह्रे धुआँ—धुआँ हैं तो दिल भी लहू—लहू&lt;br /&gt;एहसास की सलीब पर लटके हुए हैं लोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फूलों की जुस्तजू में हई काँटों से हमकिनार&lt;br /&gt;इक हल तलब सवाल—से उलझे हुए हैं लोग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘साग़र’! चला है उनके तआक़ुब में तू कहाँ ?&lt;br /&gt;जो ज़िन्दगी की क़ैद से भागे हुए हैं लोग&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;—तआक़ुब—अनुसरण में, पीछे—पीछे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२५.&lt;br /&gt;सर्द हो जाएगी यादों की चिता मेरे बाद&lt;br /&gt;कौन दोहराएगा रूदाद—ए—वफ़ा मेरे बाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बर्ग—ओ—अशजार से अठखेलियाँ जो करती है&lt;br /&gt;ख़ाक उड़ाएगी वो गुलशन की हवा मेरे बाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संग—ए—मरमर के मुजसमों को सराहेगा कौन&lt;br /&gt;हुस्न हो जाएगा मुह्ताज—ए—अदा मेरे बाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यास तख़लीक़ के सहरा की बुझेगी कैसे&lt;br /&gt;किस पे बरसेगी तख़ैयुल की घटा मेरे बाद !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे क़ातिल से कोई इतना यक़ीं तो ले ले&lt;br /&gt;क्या बदल जाएगा अंदाज़—ए—जफ़ा मेरे बाद ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी आवाज़ को कमज़ोर समझने वालो !&lt;br /&gt;यही बन जाएगी गुंबद की सदा मेरे बाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपके तर्ज़—ए—तग़ाफ़ुल की ये हद भी होगी&lt;br /&gt;आप मेरे लिए माँगेंगे दुआ मेरे बाद &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़ालिब—ओ—मीर की धरती से उगी है ये ग़ज़ल&lt;br /&gt;गुनगुनाएगी इसे बाद—ए—सबा मेरे बाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न सुने बात मेरी आज ज़माना ‘साग़र’!&lt;br /&gt;याद आएगा उसे मेरा कहा मेरे बाद.&lt;br /&gt;………………………………………………………………………………………………………………………………&lt;br /&gt;तख़लीक़—सृजन; तख़ैयुल—कल्पना ;तर्ज़—ए—तग़ाफ़ुल=उपेक्षा का ढंग&lt;br /&gt;………………………………………………………………………………………………………………………………….&lt;br /&gt;२६.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो सके तुझ से तो ऐ दोस्त! दुआ दे मुझको&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरे काम आऊँ ये   तौफ़ीक़ ख़ुदा दे मुझको&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरी आवाज़ को सुनते ही पलट आऊँगा&lt;br /&gt;हमनवा ! प्यार से इक बार सदा दे मुझको&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तू ख़ता करने की फ़ितरत तो अता कर पहले&lt;br /&gt;फिर जो आए तेरे जी में वो सज़ा दे मुझको&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं हूँ सुकरात ज़ह्र दे के अक़ीदों   का मुझे&lt;br /&gt;ये ज़माना मेरे साक़ी से मिला दे मुझको&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राख बेशक हूँ मगर मुझ में हरारत है अभी&lt;br /&gt;जिसको जलने की तमन्ना हो हवा दे मुझको&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रहबरी अहल—ए—ख़िरद की मुझे मंज़ूर नहीं&lt;br /&gt;कोई मजनूँ हो तो मंज़िल का पता दे मुझको&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरी आगोश में काटी है ज़िन्दगी मैंने&lt;br /&gt;अब कहाँ जाऊँ? ऐ तन्हाई! बता दे मुझको&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं अज़ल से हूँ ख़तावार—ए—महब्बत ‘साग़र’ !&lt;br /&gt;ये ज़माना  नया अन्दाज़—ए—ख़ता दे मुझको.&lt;br /&gt;………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..&lt;br /&gt;तौफ़ीक़=सामर्थ्य; अक़ीदा= विश्वास,धर्म ,मत,श्रद्धा; अहल—ए— खिरद=बुद्धिमान लोग&lt;br /&gt;……………………………………………………………………………………………………………………………………………………..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२७&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात कट जाये तो फिर बर्फ़ की चादर देखें&lt;br /&gt;घर की खिड़की से नई सुबह का मंज़र देखें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोच के बन में भटक जायें अगर जागें तो&lt;br /&gt;क्यों न देखे हुए ख़्वाबों में ही खो कर देखें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमनवा कोई नहीं दूर है मंज़िल फिर भी&lt;br /&gt;बस अकेले तो कोई मील का पत्थर देखें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झूट का ले के सहारा  कई  जी  लेते  हैं&lt;br /&gt;हम जो सच बोलें तो हर हाथ में ख़ंजर देखें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज़िन्दगी कठिन मगर फिर भी सुहानी है यहाँ&lt;br /&gt;शहर के लोग कभी गाँओं में आकर देखें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाँद तारों के तसव्वुर में जो नित रहते हैं&lt;br /&gt;काश ! वो लोग कभी आ के ज़मीं पर देखें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उम्र भर तट पे ही बैठे रहें क्यों हम ‘साग़र!’&lt;br /&gt;आओ, इक बार समंदर में उतर कर देखें.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२८.&lt;br /&gt;मालूम नहीं उनको ये मैं कौन हूँ , क्या हूँ&lt;br /&gt;सहराओं के सन्नाटों  में इक शोर—ए सदा हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितने ही मुसाफ़िर यहाँ सुस्ता के गये है&lt;br /&gt;मैं मील के पत्थर —सा सर—ए—राह खड़ा हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इक ख़्वाब—ए—शिकस्ता हूँ मैं फिर जुड़ नहीं सकता&lt;br /&gt;माना कि कभी उनकी निगाहों में रहा हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस शहर—ए—निगाराँ में मैं लौट आया हूँ आख़िर&lt;br /&gt;जो अहद किया था कभी अब भूल चुका हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आवाज़ के पत्थर से न तुम तोड़ सकोगे&lt;br /&gt;आईना नहीं यारो ! मैं गुम्बद की सदा हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो और थे जो ख़ाक हुए  बर्क़—ए—नज़र से&lt;br /&gt;मैं अपनी ही साँसों की हरारत से जला हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जुगनू नहीं मुझको वो हथेली पे न रक्खे&lt;br /&gt;जलता है जो तूफ़ाँ  में वो मिट्टी का दिया हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो भूल गये हों मुझे ये हो नहीं सकता&lt;br /&gt;‘साग़र’! मैं सदा जिनके ख़्यालों में रहा हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;२९.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो महफ़िलें, वो शाम सुहानी कहाँ गई&lt;br /&gt;मेह्र—ओ—वफ़ा की रस्म पुरानी कहाँ गई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुंदन —सा जिस्म चाट गई मौसमों की आग&lt;br /&gt;चुनरी वो जिसका रंग था धानी कहाँ गई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं उस सराए में होटल है आजकल&lt;br /&gt;पुरखों की वो अज़ीम निशानी कहाँ गई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने कटे हैं पेड़ कि बंजर हुई ज़मीन&lt;br /&gt;नदियों की पुरख़राम रवानी कहाँ गई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खिलते थे कँवल जिसमें वो तालाब ख़ुश्क है&lt;br /&gt;बदली वो जिससे मिलता था पानी कहाँ गई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मकर—ओ—रया के क़िस्से हैं सबकी ज़बान पर&lt;br /&gt;उल्फ़त की पुर—ख़ुलूस कहानी कहाँ गई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘साग़र’! ये आन पहुँचे हैं हम किस मुक़ाम पर&lt;br /&gt;मुड़—मुड़ के देखते हैं जवानी कहाँ गई !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३०.&lt;br /&gt;ज़र्द चेहरों पे क्यों पसीना है&lt;br /&gt;ज़िन्दगी जेठ का महीना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काश इक जाम ही उठाते वो&lt;br /&gt;ग़म से लबरेज़ आबगीना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खौफ़ तूफ़ान का उन्हें कैसा&lt;br /&gt;जिनका मंझधार में सफ़ीना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल अँगूठी—सा  है मेरा जिसमें&lt;br /&gt;आपकी याद इक नगीना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनको अमृत पिला रहे हैं आप&lt;br /&gt;उम्र भर जिनको ज़ह्र पीना  है &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़ाक़ामस्तों से पूछिये तो सही&lt;br /&gt;मुल्क़ में किस क़दर क़रीना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो तार—ए—नज़र ही ‘साग़र’!&lt;br /&gt;ज़ख़्म—ए—एहसास हमको सीना है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३१.&lt;br /&gt;हाल—ए—दिल जिनसे कहने की थी आरज़ू&lt;br /&gt;वो मिले तो हमीं  से      लगे हू—ब—हू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस्म के बन के भीतर ही    था वो कहीं&lt;br /&gt;जिसको ढूँढा किये दर—ब—दर , कू—ब—कू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करके  इक  बात ही  रूह में  आ  बसा&lt;br /&gt;कितनी दिलकश थी उस शख़्स की गुफ़्तगू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; फूल यादों के जो सेह्न—ए—दिल में खिले&lt;br /&gt;एक ख़ुश्बू —सी  बिखरा गये चार सू &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुर्ख़ चेहरों में ‘साग़र’ ! न ढूँढो मुझे&lt;br /&gt;मेरी ग़ज़लों में है मेरे दिल का लहू.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३२. &lt;br /&gt;दिल के तपते सहरा में यूँ तेरी याद का फूल खिला&lt;br /&gt;जैसे मरने वाले को हो जीवन का वरदान मिला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसके प्यार का अमृत पी कर सोचा था हो जायें अमर&lt;br /&gt;जाने कहाँ गया वो ज़ालिम तन्हाई का ज़हर पिला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ज़रा —सी बात पे ही वो रग—रग को पहचान गई&lt;br /&gt;दुनिया का दस्तूर यही है यारो! किसी से कैसा गिला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरमानों के शीशमहल में ख़ामोशी , रुस्वाई थी&lt;br /&gt;एक झलक पाकर हमदम की फिर से मन का तार हिला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सपने बुनते—बुनते कैसे  बीत गये दिन बचपन के&lt;br /&gt;ऐ मेरे ग़मख़्वार ! न मुझको फिर से वो दिन याद दिला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्सानों  के जमघट  में वो  ढूँढ  रहा  है  ‘साग़र’ को&lt;br /&gt;अभी गया जो दिल के लहू से ग़ज़लों के कुछ फूल खिला.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३३.&lt;br /&gt;दिल में यादों का धुआँ है यारो !&lt;br /&gt;आग की ज़द में मकाँ है यारो !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हासिल—ए—ज़ीस्त कहाँ है यारो !&lt;br /&gt;ग़म तो इक कोह—ए—गिराँ है यारो !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं हूँ इक वो बुत—ए—मरमर जिसके&lt;br /&gt;मुँह में पत्थर की ज़बाँ है यारो !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूर अफ़रोज़ उजालों के लिए&lt;br /&gt;रौशनी ढूँढो कहाँ है यारो !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टिमटिमाते हुए तारे हैं गवाह&lt;br /&gt;रात भीगी ही कहाँ है यारो !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पे होता है बहारों का गुमाँ&lt;br /&gt;कहीं देखी है ये खिज़ाँ है यारो !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम बहे जाते हैं तिनकों की तरह&lt;br /&gt;ज़िन्दगी मील—ए—रवाँ है यारो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढल गई अपनी जवानी हर चंद&lt;br /&gt;दर्द—ए—उल्फ़त तो जवाँ है यारो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नीम—जाँ जिसने किया ‘साग़र’ को &lt;br /&gt;एक फूलों की कमाँ है यारो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३४.&lt;br /&gt;है शाम—ए—इन्तज़ार अजब बेकली की शाम&lt;br /&gt;इतनी उदास तो न हो यारब ! किसी की शाम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आई जो दिन ढले ही किसी बेवफ़ा की याद&lt;br /&gt;शाम—ए—फ़िराक़ बन गई है बन्दगी की शाम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महरूमियों कई आग में तन्हा जला हूँ मैं&lt;br /&gt;बीते भी युग मगर न हुई ज़िन्दगी की शाम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओझल हुआ मैं उनकी नज़र से तो यूँ लगा&lt;br /&gt;थी कितनी पुरसुकून वो उसकी गली शाम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़ितरत जुदा—जुदा है मिलें भी तो किस तरह&lt;br /&gt;मैं सुबह हूँ ख़ुलूस की वो बेरुख़ी की शाम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अहल—ए—चमन ने सुबह—ए—मसर्रत के नाम से &lt;br /&gt;बख़्शी है हमको यारो !  ग़म—ओ—बेबसी की शाम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं ख़ुद को भूल जाऊँ तो शयद मिले क़रार&lt;br /&gt;मेरे नसीब में है कहाँ बेखुदी की शाम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ इन्तज़ाम—ए—जाम  करो अब तो हमदमो! &lt;br /&gt;डसने लगी है रूह को फिर बेबसी की शाम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; सपनों के गाँओं बस के उजड़ते चले गये&lt;br /&gt;‘साग़र’ ! न मिल सकी मुझे इक भी ख़ुशी की शाम .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३५.&lt;br /&gt;उमड़े हुए अश्कों को रवानी नहीं देता&lt;br /&gt;अब हादसा भी कोई कहानी नहीं देता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तन्हाई के सहरा में हवा का कोई झोंका&lt;br /&gt;बचपन की कोई याद पुरानी नहीं देता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये वक़्त है ज़ालिम कि मेरे माँगने पर भी&lt;br /&gt;लौटा के मुझे मेरी जवानी नहीं देता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हैरत है कि इस दौर में समझें जिसे अपना&lt;br /&gt;वो ग़म के सिवा कोई निशानी नहीं देता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मशहूर थी जिस शहर की मेहमान नवाज़ी&lt;br /&gt;प्यासों को वहाँ अब कोई पानी नहीं देता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘साग़र’! है तमन्ना कि ग़ज़ल हम भी सुनायें&lt;br /&gt;मौसम ही कोई शाम सुहानी नहीं देता .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३६.&lt;br /&gt;कहाँ चला गया बचपन का वो समाँ यारो!&lt;br /&gt;कि जब ज़मीन पे जन्नत का था गुमाँ यारो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहार—ए—रफ़्ता को ढूँढें कहाँ यारो!&lt;br /&gt;कि अब निगाहों में यादों की है ख़िज़ाँ यारो! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समंदरों की तहों से निकल के जलपरियाँ &lt;br /&gt;कहाँ सुनाती है अब हमको लोरियाँ यारो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुझा—बुझा —सा है अब चाँद आरज़ूओं का&lt;br /&gt;है माँद—माँद मुरादों की कहकशाँ यारो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उफ़क़ पे डूबते सूरज के खूँ की लाली है&lt;br /&gt;ठहर गये हैं ख़लाओं के क़ारवाँ यारो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भटक गये थे जो ख़ुदग़र्ज़ियों के सहरा में&lt;br /&gt;हवस ने उनको बनाया है नीम जाँ यारो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़मों  के घाट उतारी गई हैं जो ख़ुशियाँ&lt;br /&gt;फ़ज़ा में उनकी चिताओं का है धुआँ यारो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तड़प के तोड़ गया दम हिजाब का पंछी&lt;br /&gt;झुकी है इस तरह इख़लाक़ की कमाँ यारो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ुलूस बिकता है ईमान—ओ—सिदक़ बिकते हैं&lt;br /&gt;बड़ी अजीब है दुनिया की ये दुकाँ यारो !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये ज़िन्दगी तो बहार—ओ—ख़िज़ाँ का संगम है&lt;br /&gt;ख़ुशी ही दायमी ,ग़म ही न जाविदाँ यारो !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क़रार अहल—ए—चमन को नसीब हो कैसे&lt;br /&gt;कि हमज़बान हैं सैयाद—ओ—बाग़बाँ यारो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा दिल है किसी लाला ज़ार का बुलबुल&lt;br /&gt;कभी मलूल कभी है ये शादमाँ यारो !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क़दम—क़दम पे यहाँ असमतों  के मक़तल हैं&lt;br /&gt;डगर—डगर पे वफ़ाओं के इम्तहाँ यारो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिरह की रात सितारे तो सो गये थे मगर&lt;br /&gt;सहर को फूट के रोया था आसमाँ यारो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिले क़रार मेरी रूह को तभी ‘साग़र’!&lt;br /&gt;मेरी जबीं हो और उनका हो आस्ताँ यारो!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३७.&lt;br /&gt;नज़र नवाज़ बहारों के गीत गायेंगे&lt;br /&gt;सुरूर—ओ—कैफ़ की दुनिया नई बसायेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है ऐतमाद हमें अपने ज़ोर—ए—बाज़ू पर&lt;br /&gt;कभी किसी का न अहसान हम उठायेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मय—ए—वफ़ा का पियाला हर एक गुल हो जहाँ&lt;br /&gt;वतन के बाग़ को वो मयकदा बनायेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रहे हयात की तारीकियाँ मिटाने को&lt;br /&gt;क़दम—क़दम पे उजालों के गीत गायेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करेंगे राह—ए—महब्बत में जान तक क़ुर्बाँ&lt;br /&gt;वफ़ा के फूल रग—ए—संग में खिलायेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुझा सकें न जिसे हादिसात के तूफ़ाँ&lt;br /&gt;रह—ए—हयात में वो शमअ हम जलायेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पड़ेगी माँद अगर शमअ—ए—आरज़ू—वफ़ा&lt;br /&gt;तो आसमान से तारे भी तोड़ लायेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे दम से है ‘साग़र’! ये रौनक़—ए—महफ़िल&lt;br /&gt;न हम हुए तो ये नग़्मे कहाँ से आयेंगे ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३८.&lt;br /&gt;हु्स्न—ए—चमन से ख़ाक— ए—मनाज़िर ही ले चलें&lt;br /&gt;ज़ेह्नों में फ़स्ल—ए—गुल का तसव्वुर ही ले चलें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीती रूतों की याद रहे दिल में बरक़रार&lt;br /&gt;आँखों में हुस्न—ए—चश्म—ए गुल—ए—तर ही  ले चलें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम है ज़मीं की ख़ाक तो ऐ आसमाँ के चाँद&lt;br /&gt;आँखों को एक बार ज़मीं पर ही ले चलें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहुँचे हुए फ़क़ीर हैं शायद न फिर मिलें  &lt;br /&gt;उनसे कोई दुआ—ए—मयस्सर ही ले चलें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झुलसा न दे हमें कहीं तन्हाइयों की धूप&lt;br /&gt;साथ अपने कोई हुस्न का पैकर ही ले चलें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखा था हमने जो कभी बचपन के दौर में&lt;br /&gt;ज़ेह्नों में ख़्वाब का वही मंज़र ही ले चले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहरा—ए—ग़म की प्यास बुझाने के वास्ते&lt;br /&gt;पलकों पे आँसुओं का समंदर ही ले चलें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साकी के इल्तिफ़ात का इतना तो पास हो&lt;br /&gt;आए हैं मयकदे में तो साग़र ही ले चलें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस अजनबी से पहले मुलाक़ात तक न थी&lt;br /&gt;अब सोचते हैं क्यों न उसे घर ही ले चलें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘साग़र’ ! अगर नविश्ता—ए—क़िस्मत न मिल सके&lt;br /&gt;सीने पे क्यों न सब्र का पत्थर ही ले चलें ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;…………………………………………………………………………&lt;br /&gt;इल्तिफ़ात = कृपा, दया, इनायत&lt;br /&gt;……………………………………………………………………&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;३९.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई आवारा हवा मुझको उड़ा ले जाये&lt;br /&gt;या कोई लहर किनारे से उड़ा ले जाये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो जहाँ भी हो मुझे याद तो करता होगा&lt;br /&gt;कोई उस तक मेरा पैग़ाम—ए—वफ़ा ले जाये &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है तमन्ना जिसे क़तरे से गौहर बनने की&lt;br /&gt;उसको कब जाने कहाँ कोई हवा ले जाये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फूल जो आज शगुफ़्ता है उसे देख तो लो&lt;br /&gt;जाने कल उसको कहाँ बाद—ए—सबा ले जाये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके इसरार को टालें भी कहाँ तक यारो !&lt;br /&gt;अब जहाँ चाहे हमें दिल का कहा ले जाये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशियाँ अपना न साहिल पे बनाओ ‘सागर’!&lt;br /&gt;इस को सैलाब अचानक न बहा ले जाये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४०.&lt;br /&gt;तूफ़ानी शब , घोर अँधेरा , मंज़िल दूर , हवाएँ सर्द&lt;br /&gt;ऐसे में जो घर से निकला था कोई फ़ौलादी मर्द&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूल चाटते नंगे जिस्मों को, पीठ से चिपके पेटों को&lt;br /&gt;रंगों की पहचान ही क्या है सुर्ख़, सफ़ेद, हरा कि ज़र्द&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आम इन्सान के ग़म में डूबी जो दिलकश तहरीर करे&lt;br /&gt;इसको ही कहती है दुनिया जनता का सच्चा हमदर्द&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहे कितनी उजली रक्खे चादर कोई गुनाहों की&lt;br /&gt;पड़ ही जाती है दामन पर इक दिन रुस्वाई की गर्द&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेले में जो यार मिला था आज न जाने है वो कहाँ&lt;br /&gt;अब तो हमें ही सहना होगा तन्हा तन्हाई का दर्द&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने, तूने, उसने जो महसूस किया तन्हाई में&lt;br /&gt;हर चेहरे से झलक रहा है मेरा तेरा उसका दर्द&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भटक रहा है आज भी बचपन और शबाब की गलियों में&lt;br /&gt;जाने क्या गुल और खिलायेगा ये दिल आवारागर्द&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने इक—इक शेर की खातिर ख़ून जलाया है दिल का&lt;br /&gt;यारो! ‘साग़र’ से मत पूछो क्यों है उसका चेहरा ज़र्द .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;41.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितनी हसीं है शाम सुनाओ कोई ग़ज़ल&lt;br /&gt;गर्दिश में आये जाम सुनाओ कोई ग़ज़ल &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लौट आयें जिससे प्यार की ख़ुश्बू लिए हुए&lt;br /&gt;रंगीन सुबह—ओ—शाम सुनाओ कोई ग़ज़ल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घूँघट उठा के फूलों का फिर प्यार से हमें&lt;br /&gt;ये रुत करे सलाम सुनाओ कोई ग़ज़ल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो कम करे फ़िराक़ज़दा साअतों का बोझ&lt;br /&gt;ले ग़म से इन्तक़ाम सुनाओ कोई ग़ज़ल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रुत कोई भी हो इतना है ग़म अहल—ए—सुख़न का&lt;br /&gt;शे`र—ओ—सुख़न है काम सुनाओ कोई ग़ज़ल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसका इक एक शे`र हो ख़ु्द ही इलाज—ए—ग़म&lt;br /&gt;जो ग़म करे तमाम सुनाओ कोई ग़ज़ल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जंगल हैं बेख़ुदी के जो शहर—ए—अना से दूर&lt;br /&gt;कर लें वहीं क़याम  सुनाओ कोई ग़ज़ल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होंठों पे तन्हा चाँद के आया है प्यार से&lt;br /&gt;‘साग़र’! तुम्हारा नाम  सुनाओ कोई ग़ज़ल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साअतों=क्षणों&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४२.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो बस के मेरे दिल में भी नज़रों से दूर था&lt;br /&gt;दुनिया का था क़ुसूर न उसका क़ुसूर था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम खो गये थे ख़ुद ही किसी की तलाश में &lt;br /&gt;ये हादिसा भी इश्क़ में होना ज़रूर था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्दन झुकी तो थी तेरे दीदार के लिये&lt;br /&gt;देखा मगर तो शीशा—ए—दिल चूर—चूर था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बदली जो रुत तो शाम—ओ—सहर खिलखिला उठे&lt;br /&gt;मंज़र वो दिलनवाज़ ख़ुदा का ज़हूर था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसके बग़ैर कुछ भी दिखाई दे  मुझे&lt;br /&gt;कैसे कहूँ वो मेरी निगाहों का नूर था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल तक तो समझते थे गुनहगार वो मुझे&lt;br /&gt;क्यूँ आज कह रहे हैं कि मैं बेक़ुसूर था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो मुझको क़त्ल करके सुकूँ से न सो सका&lt;br /&gt;दुश्मन तो था ज़रूर मगर बा—शऊर था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साग़र वो कोसते हैं ज़माने को किसलिए&lt;br /&gt;उनको डुबो गया जो उन्हीं का ग़रूर था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४३.&lt;br /&gt;समझ के रिन्द न महफ़िल में तू उछाल मुझे&lt;br /&gt;मैं गिर न जाऊँ कहीं साक़िया! सँभाल मुझे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरी गली से गुज़रता हूँ मूँद कर आँखें&lt;br /&gt;कि बाँध ले न कहीं तेरा मोह जाल मुझे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नज़र तो क्या मैं तेरी रूह से उतर जाऊँ&lt;br /&gt;हया के रेशमी गुंजल से तो निकाल मुझे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे जुनून का कारन तो पूछता मुझसे&lt;br /&gt;गया जो वहम के अंधे कुएँ में डाल मुझे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नक़ाब रुख़ से उठा, सामने तो आ इक पल&lt;br /&gt;हूँ तेरी दीद का तालिब न कल पे टाल मुझे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो ख़्वाब हूँ जो बिखर जाएगा सहर होते&lt;br /&gt;तुझे क़सम है निगाहों में यूँ न पाल मुझे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी तहों में मिलेंगे ख़ुलूस के मोती&lt;br /&gt;मैं इक वफ़ा का समंदर हूँ तू खँगाल मुझे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़ी लतीफ़ थी उसके बदन की धूप मगर&lt;br /&gt;जला ही डालेगी ऐसा न था ख़्याल मुझे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गो एक पल ही वो ओझल मेरी नज़र से हुआ&lt;br /&gt;लगा कि उससे मिले हो चुके हैं साल मुझे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे शफ़ीक़, मेरे हमनवा, मेरे रहबर!&lt;br /&gt;अना की भूल भुलैयाँ से तू निकाल मुझे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये उसकी याद का आसेब तो नहीं ‘साग़र’!&lt;br /&gt;कि खुल के साँस भी लेना है अब मुहाल मुझे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ख़ुलूस=निष्कपटता; सरलता,सादगी; शफ़ीक़=कृपालु; आसेब=प्रेतबाधा;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४४.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़म—ए—अंजाम—ए—महब्बत से छुड़ाया जाये&lt;br /&gt;दिल—ए—मजरूह को फिर होश में लाया जाये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शब—ए—फ़ुर्क़त के अँधेरों को मिटाने के लिए&lt;br /&gt;दिया अश्कों का सरे शाम जलाया जाये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो जो कहते थे कि सावन में मिलेंगे हम से&lt;br /&gt;उनका वादा उन्हें फिर याद दिलाया जाये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये नदी तट, ये जवाँ रुत, ये सुनहरी शामें&lt;br /&gt;कैसे उस जान—ए—तमन्ना को बुलाया जाये ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आओ सूखे हुए कुछ फूल इकठ्ठे कर लें&lt;br /&gt;इस बहाने ही गई रुत को बुलाया जाये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आस के गगन पे पंछी —सा उसे उड़ने दो&lt;br /&gt;दिल पे महरूमी का क्यों तीर चलाया जाये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यास जुग—जुग की ये मिटती नहीं अमृत से भी &lt;br /&gt;हम वो प्यासे हैं जिन्हें ज़ह्र पिलाया जाये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छेड़ कर फिर से किसी भूली हुई याद की धुन&lt;br /&gt;दिल के सोये हुए ज़ख़्मों को जगाया जाये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या करें अपना मुक़द्दर तो यही है ‘साग़र’!&lt;br /&gt;उम्र भर दर्द का इक बोझ उठाया जाये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महरूमी= वंचित होने की स्थिति&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४५.&lt;br /&gt;हम नशीं  ही उठ गये तो हम कहाँ रह जायेंगे&lt;br /&gt;इस नगर में एक दिन ख़ाली मकाँ रह जायेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इम्तियाज़—ए—आमद—ओ—मक़सूद ही मिट जायेगा&lt;br /&gt;सजदावर कोई न होगा आस्ताँ रह जायेंगे &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फूल खिलते थे ख़ुलूस—ओ—सिदक़ के जिसमें कभी&lt;br /&gt;उन ज़मीनों को तरसते आस्माँ रह जायेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर यूँ ही होती रही अहल—ए—हवस में साज़िशें&lt;br /&gt;वादियों में चंद उजड़े आशियाँ रह जायेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाख हो जाये उन्हें अपनी खता का ऐतराफ़&lt;br /&gt;फ़ासिले फिर भी दिलों के दरमियाँ रह जायेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; दुश्मनों की चार सू इक भीड़ —सी होगी मगर&lt;br /&gt;फिर भी उसमें कुछ हमारे मेह्रबाँ रह जायेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हीर—राँझे की महब्बत याद आयेगी किसे&lt;br /&gt;इश्क़ की राहों में ख़ाली इम्तेहाँ रह जायेंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मर के भी ‘साग़र’! न दुनिया भूल पायेगी हमें&lt;br /&gt;आसमाँ में हम मिसाले कहकशाँ रह जायेंगे.&lt;br /&gt;………………………………………………………………………………………………………………………….&lt;br /&gt;ऐतराफ़=स्वीकृति&lt;br /&gt;……………………………………………………………………………………………………………………….&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४६.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सहर का रंग गुलों का निखार है तुझ से&lt;br /&gt;चमन में आमद—ए—फ़स्ल—ए—बहार है तुझ से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चराग—ए—बज़्म तेरे ही लिये फ़िरोज़ाँ है&lt;br /&gt;फ़ज़ा—ए—शेर—ओ—सुखन साज़गार है तुझ से &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरे बग़ैर हैं वीरान वादियाँ दिल की&lt;br /&gt;ख़िज़ाँ—नसीब दिलों को क़रार है तुझ से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरे ही दम से हैं आबाद शाद मयख़ाने&lt;br /&gt;नज़र— नज़र में सुरूर—ओ—ख़ुमार है तुझ से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मताए—हुस्न—ए—बहाराँ है कितनी दिल आवेज़&lt;br /&gt;ये उम्र भर ऐ खुदा ! आश्कार है तुझ से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुझी से ख़ाना—ए—दिल में है रौशनी ऐ खुदा!&lt;br /&gt;मेरी नज़र में खिज़ाँ भी बहार है तुझ से .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४७.&lt;br /&gt;परदेस चला जाये जो दिलबर तो ग़ज़ल कहिये&lt;br /&gt;और ज़ेह्न हो यादों से मुअत्तर तो ग़ज़ल कहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कब जाने सिमट जाये  वो जो साया है बेग़ाना&lt;br /&gt;जब अपना ही साया हो बराबर तो ग़ज़ल कहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल ही में न हो दर्द तो क्या ख़ाक ग़ज़ल होगी&lt;br /&gt;आँखों में हो अश्कों का समंदर तो ग़ज़ल कजिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम जिस को भुलाने के लिये नींद में खो जायें&lt;br /&gt;आये वही ख़्वाबों में जो अक्सर तो ग़ज़ल कहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़ुर्क़त के अँधेरों से निकलने के लिये दिल का&lt;br /&gt;हर गोशा हो अश्कों से मुनव्वर तो ग़ज़ल कहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओझल जो नज़र से रहे ताउम्र वही हमदम&lt;br /&gt;जब सामने आये दम—ए—आख़िर तो ग़ज़ल कहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना जिसे समझे थे उस यार की बातों से&lt;br /&gt;जब चोट अचानक लगे दिल पर तो ग़ज़ल कहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या गीत जनम लेंगे झिलमिल से सितारों की&lt;br /&gt;ख़ुद चाँद उतर आये ज़मीं पर तो ग़ज़ल कहिये&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तक के सफ़र में तो फ़क़त धूप ही थी ‘साग़र’!&lt;br /&gt;साया कहीं मिल जाये जो पल भर तो ग़ज़ल कहिये.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४८.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब क्या बताएँ क्या हुए चिड़ियों के घौंसले&lt;br /&gt;तूफ़ाँ की नज़्र हो गए चिड़ियों के घौंसले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर घर के ही दरीचों छतों में छुपे हैं साँप&lt;br /&gt;महफ़ूज़ अब नहीं रहे  चिड़ियों के घौंसले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पीपल के उस दरख़्त के कटने की देर थी&lt;br /&gt;आबाद फिर न हो सके चिड़ियों के घौंसले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब से हुए हैं सूखे से खलिहान बे—अनाज&lt;br /&gt;लगते हैं कुछ उदास— से चिड़ियों के घौंसले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बढ़ता ही जा रहा है जो धरती पे दिन—ब—दिन&lt;br /&gt;उस शोर—ओ—गुल में खो गये चिड़ियों के घौंसले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पतझड़ में कुछ लुटे तो कुछ उजड़े बहार में &lt;br /&gt;सपनों की बात हो गये चिड़ियों के घौंसले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बनने लगे हैं जब  से मकाँ  कंकरीट  के&lt;br /&gt;तब से हैं दर—ब—दर हुए चिड़ियों के घौंसले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तारीख़ है गवाह कि फूले —फले बहुत&lt;br /&gt;जो आँधियों से बच गए चिड़ियों के घौंसले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब बज उठा शह्र की किसी मिल का सायरन&lt;br /&gt;‘साग़र’ को याद आ गये चिड़ियों के घौंसले.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;४९.&lt;br /&gt;जिसको पाना है उसको खोना है&lt;br /&gt;हादिसा एक दिन ये होना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़र्श पर हो या अर्श पर कोई&lt;br /&gt;सब को इक दिन ज़मीं पे होना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहे कितना अज़ीम हो इन्साँ&lt;br /&gt;वक़्त के हाथ का खिलोना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल पे जो दाग़ है मलामत का&lt;br /&gt;वो हमें आँसुओं से धोना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चार दिन हँस के काट लो यारो!&lt;br /&gt;ज़िन्दगी उम्र भर का रोना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छेड़ो फिर से कोई ग़ज़ल ‘साग़र’!&lt;br /&gt;आज मौसम बड़ा सलोना है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;५०.&lt;br /&gt;हद्द—ए—नज़र तक क्या  है देख!&lt;br /&gt;अश्कों का दरिया है देख!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्दर से बाहर तो आ&lt;br /&gt;कितनी खुली हवा है देख!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माली! तेरे गुलशन की&lt;br /&gt;बदली हुई फ़िज़ा है देख!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्सानों के जमघट में &lt;br /&gt;हर कोई तन्हा है देख!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच तो कह लेकिन सच की&lt;br /&gt;कितनी सख़्त सज़ा है देख!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज के पहलू में भी&lt;br /&gt;छाई हुई घटा है देख!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़म से क्यूँ घबराता है&lt;br /&gt;तेरे साथ ख़ुदा है देख!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरा अपना साया भी &lt;br /&gt;तुझ से आज ख़फ़ा है देख! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘साग़र’! बंद दरीचे से&lt;br /&gt;आई एक सदा है देख! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;५१.&lt;br /&gt;थी आरज़ू कि ख़ूब हँसायेगी ज़िन्दगी&lt;br /&gt;सोचा न था कि इतना रुलायेगी ज़िन्दगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दामन छुड़ा के इससे कहाँ जायेगा बशर ?&lt;br /&gt;हाथ अपने हर क़दम पे दिखायेगी ज़िन्दगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन में नहीं है दम कि करें इसका सामना&lt;br /&gt;उन बुज़दिलों को खूब सतायेगी ज़िन्दगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन्सानियत के वास्ते क़ुर्बान कर इसे&lt;br /&gt;दामन के सारे दाग़ मिटायेगी ज़िन्दगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इक ख़्वाब ने ही नींद से महरूम कर दिया&lt;br /&gt;अब और कितने ख़्वाब दिखायेगी ज़िन्दगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोके से रुक सकेगी न गर्दिश नसीब की&lt;br /&gt;यूँ तो कई फ़रेब दिखायेगी ज़िन्दगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो दिन भी थे कि लगती थी फ़स्ले बहार —सी&lt;br /&gt;वैसी कभी न लौट के आयेगी ज़िन्दगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘सागर’! गुज़ार दे इसे सच की तलाश में&lt;br /&gt;यूँ तो किसी भी काम न आयेगी ज़िन्दगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;५२.&lt;br /&gt;ख़ून—ए—हसरत से तेरा रंग निखारा जाए&lt;br /&gt;ज़ुल्फ़—ए—हस्ती तुझे इस तरह सँवारा जाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह हुई शाम ढली और यूँ ही शब गुज़री&lt;br /&gt;वक़्ते—रफ़्ता तुझे अब कैसे पुकारा जाए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौसम—ए—गुल हो फ़ज़ाओं में महक हो हर सू&lt;br /&gt;फिर तसव्वुर में कोई नक़्श उभारा जाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुनहगारों को सज़ा देने चले हो लेकिन&lt;br /&gt;देख लेना कोई मासूम न मारा जाए &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाम हो जाए तो मयखाने का दरवाज़ा खुले&lt;br /&gt;फिर ग़म—ए—ज़ीस्त को शीशे में उतारा जाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम मुसाफ़िर हैं तो ये जग है सराये ‘सागर’!&lt;br /&gt;क्यों न मिल—जुल के यहाँ वक्त गुज़ारा जाए?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;५३.&lt;br /&gt;बोझल है कितनी शाम—ए—जुदाई तेरे बग़ैर&lt;br /&gt;दुनिया लगे है दर्द की खाई तेरे बग़ैर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूँ भी हमारी जान पे बन आई तेरे बग़ैर&lt;br /&gt;इक साँस भी न चैन की आई तेरे बग़ैर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरे बग़ैर सूनी है ख़्वाबों की अंजुमन&lt;br /&gt;महशर लगे है सारी ख़ुदाई तेरे बग़ैर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ले दे इक तू ही तो था सरमाया—ए—हयात&lt;br /&gt;थी और क्या हमारी कमाई तेरे बग़ैर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम क्या गये कि रूठ गया वो भी साथ—साथ&lt;br /&gt;दुनिया है अब नसीब—ए—दुहाई तेरे बग़ैर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गो अब के भी चमन की फ़जाओं पे था निखार&lt;br /&gt;लेकिन हमें बहार न भाई तेरे बग़ैर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कलियाँ चटक रही थीं हवाओं में था सुरूर&lt;br /&gt;कोई फ़ज़ा भी रास न आई तेरे बग़ैर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना रफ़ीक़, अपना मेह्रबान—ओ—ग़मगुसार&lt;br /&gt;इक भी दिया न हम को दिखाई तेरे बग़ैर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क़ैद—ए—ग़म—ए—हयात से ‘साग़र’! तू ही बता&lt;br /&gt;कैसे मिलेगी हम को रिहाई तेरे बग़ैर .&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;५४.&lt;br /&gt;लाख गोहर फ़िशानियाँ होंगी&lt;br /&gt;हम न होंगे कहानियाँ होंगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसे पायेंगे हम पता अपना &lt;br /&gt;ग़म की वो बेकरानियाँ होंगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टूटे महराब गिरी दीवारें&lt;br /&gt;मंदिरों की, निशानियाँ होंगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना साया भी अजनबी होगा&lt;br /&gt;वक़्त की ज़ुल्मरानियाँ होंगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और होगा भी क्या महब्बत में&lt;br /&gt;हाँ, मगर बदगुमानियाँ होंगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आरज़ूओं की भीड़ में ‘साग़र’!&lt;br /&gt;ज़ख़्म ख़ुर्दा जवानियाँ होंगी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ५५. &lt;br /&gt;राह—ए—वफ़ा में नाम कमाने का वक़्त है&lt;br /&gt;अपने लहू में आप नहाने का वक़्त है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तक़्दीस—ओ—एहतराम—ए—महब्बत के वास्ते&lt;br /&gt;अहल—ए—जफ़ा के नाज़ उठाने का वक़्त है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिनसे थी रहबरी की तवक़्क़ो हमें कभी&lt;br /&gt;उन रहबरों को राह दिखाने का वक़्त है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़मगीन हो न जायें कहीं वो भी इसलिये&lt;br /&gt;अपनों से दिल के ज़ख्म छुपाने का वक़्त है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी तलाश के लिए सहरा—ए—फ़िक्र में&lt;br /&gt;शेर—ओ—सुख़न के फूल खिलाने का &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साये तवील हो गये फिर शाम ढल चली&lt;br /&gt;अब शमअ—ए—इन्तज़ार जलाने का वक़्त है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐ बुलबुलो ! सुनो तो ख़िज़ाँ की पुकार को&lt;br /&gt;गुलशन से अब बहार के जाने का वक़्त है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टकरा के जिन से चूर हुए आईने कई&lt;br /&gt;उन पत्थरों को फूल बनाने का वक़्त है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बसते हैं जिन की गोद में पैकर ख़ुलूस के&lt;br /&gt;उन वादियों में जा के न आने का वक़्त है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जागो ! सहर क़रीब है मदहोश मयकशो!&lt;br /&gt;सँभलो! कि अब तो होश में आने का वक़्त है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘साग़र’! हविस के सहरा की जलती फ़ज़ाओं में&lt;br /&gt;सब्र—ओ—सुकूँ के शह्र बसाने का वक़्त है.&lt;br /&gt;तक़्दीस—ओ—एहतराम—ए—महब्बत=प्रेम की पवित्रता और सम्मान ;&lt;br /&gt;अहल—ए—जफ़ा=अत्याचारी&lt;br /&gt;oooooooooooooooooo&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3704081507814008687-3860073605504776336?l=dwijandghazal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dwijandghazal.blogspot.com/feeds/3860073605504776336/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3704081507814008687&amp;postID=3860073605504776336' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3704081507814008687/posts/default/3860073605504776336'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3704081507814008687/posts/default/3860073605504776336'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dwijandghazal.blogspot.com/2008/06/blog-post_4893.html' title='कुछ और ग़ज़लें...'/><author><name>द्विजेन्द्र ‘द्विज’</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16379129109381376790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://bp0.blogger.com/_8Gu4F-EdIh0/SD119gdj7mI/AAAAAAAAAAU/cXxdkAh97pI/S220/Dwij.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SGNz8nWFgZI/AAAAAAAAAE0/mXJkqNL_mfE/s72-c/p2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3704081507814008687.post-3501956548631810950</id><published>2008-06-25T04:29:00.000-07:00</published><updated>2008-06-25T04:31:15.436-07:00</updated><title type='text'>साग़र साहेब की और ग़ज़लें</title><content type='html'>५.&lt;br /&gt;अर्ज़—ओ—समा में बर्क़—सा लहरा गया हूँ मैं&lt;br /&gt;हर सिम्त एक नूर—सा फैला गया हूँ मैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया को क्या ख़बर है कि क्या पा गया हूँ मैं&lt;br /&gt;सिदक़—ओ—वफ़ा की राह में काम आ गया हूँ मैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फागुन की सुबह—सा कभी मैं झिलमिला गया&lt;br /&gt;सावन की शाम— सा कभी धुँधला गया हूँ मैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आईना—ए—ज़मीर पे जब भी नज़र पड़ी&lt;br /&gt;अपना ही अक़्स देख के शरमा गया हूँ मैं&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;गुमनामियों का मेरी ठिकाना नहीं कोई&lt;br /&gt;अपने ही घर में अजनबी कहला गया हूँ मैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना पता मिले तो कहीं साँस ले सकूँ&lt;br /&gt;हंगामा—ए—वजूद से तंग आ गया हूँ मैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘साग़र’! हिसार—ए—ज़ात से छूटा तो यूँ लगा&lt;br /&gt;इक उम्र— क़ैद काट के घर आ गया हूँ मैं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;६.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खिला रहता था जिनके प्यार का मधुमास आँखों में&lt;br /&gt;वही अब लिख गए हैं विरह का इतिहास आँखों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करेगी शांत क्या उसको अब उनके प्यार की बरखा&lt;br /&gt;न जाने कौन से जन्मों की है ये प्यास आँखों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे दिल की अयोध्या में न जाने कब हो दीवाली&lt;br /&gt;झलकता है अभी तो राम का बनवास आँखों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पवन जब मन के दरवाज़े पे  हल्की—सी भी दस्तक दे&lt;br /&gt;तो लौट आता है फिर खोया हुआ विश्वास आँखों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उभरती है पुरानी चोट कोई जब कसक बनकर&lt;br /&gt;तो जाग उठता है फिर से दर्द का एहसास आँखों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये किसके पाँओं की आहट ने चौंकाया मुझे ‘साग़र’!&lt;br /&gt;कि उग आई है तृष्णाओं की कोमल घास आँखों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;७.&lt;br /&gt;सुबह हर घर के दरीचों में चहकती चिड़ियाँ&lt;br /&gt;दिन के आग़ाज़ का पैग़ाम हैं देती चिड़ियाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़स्ल पक जाने की उम्मीद पे जीती हैं सदा&lt;br /&gt;सब्ज़ खेतों  की मुँडेरों पे फुदकती चिड़ियाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मकानों में झरोखे नहीं हैं शीशे हैं&lt;br /&gt;जिनसे टकरा के ज़मीं पर हैं तड़पती चिड़ियाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी वीरान हवेली के सेह्न में अक्सर&lt;br /&gt;उसके गुमगश्ता मकीनों को हैं रोती चिड़ियाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जेठ में गाँव के सूखे हुए तालाब के पास&lt;br /&gt;जल की इक बूँद की ख़ातिर हैं भटकती चिड़ियाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेत के खेत ही चुग जाते हैं ज़ालिम कव्वे&lt;br /&gt;और हर फ़स्ल पे रह जाती हैं भूखी चिड़ियाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सोचता हूँ मैं ये ‘साग़र’! कि पनाहों के बग़ैर &lt;br /&gt;ख़त्म हो जाएँगी इक दिन ये बेचारी चिड़ियाँ.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;८. &lt;br /&gt;जो इक पल भी किसी के दर्द में शामिल नहीं होता&lt;br /&gt;उसे पत्थर ही कहना है बजा वो दिल नहीं होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये शह्र—ए —आरज़ू है जिसमे हासिल है किसे इरफ़ाँ&lt;br /&gt;यहाँ अरमाँ मचलते हैं सुकून—ए—दिल नहीं होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर जीना है वाँ मुश्किल तो मरना याँ नहीं आसाँ&lt;br /&gt;जहाँ कोई किसी के दर्द का हामिल नहीं होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सफ़ीना बच के तूफ़ाँ से निकल आए आए भी तो अक्सर&lt;br /&gt;जहाँ होता था पहले उस जगह साहिल नहीं होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वो अपनी जुस्तजू में दूध की तासीर तो लाए&lt;br /&gt;फ़क़त पानी बिलोने से तो कुछ हासिल नहीं होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ अपने चाहने वाले ही हिम्मत तोड़ देते हैं&lt;br /&gt;वगरना काम दुनिया में कोई  मुश्किल नहीं होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क़दम जो जानिब—ए—मंज़िल उठे वो ख़ास होता है&lt;br /&gt;जहाँ में हर क़दम ही हासिल—ए— मंज़िल नहीं होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमीं कल मीर—ए—महफ़िल थे न जाने क्या हुआ ‘साग़र’!&lt;br /&gt;हमारा ज़िक्र भी अब तो सरे— महफ़िल नहीं होता.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;९.&lt;br /&gt;बसा है जब से आकर दर्द—सा अज्ञात आँखों में&lt;br /&gt;तभी से जल रही  है आग —सी दिन—रात आँखों में &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अजब गम्भीर—सा इक मौन था उन शुष्क अधरों पर&lt;br /&gt;मचा था कामनाओं का मगर उत्पात आँखों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न दे क़िस्मत किसी को विरह के दिन पर्बतों जैसे&lt;br /&gt;तड़पते ही गुज़र जाती है जब हर रात आँखों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ढली है जब से उनके प्यार की वो धूप मीठी —सी&lt;br /&gt;उसी दिन से उमड़ आई है इक बरसात आँखों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न अवसर ही मिला हमको व्यथा अपनी सुनाने का&lt;br /&gt;सिसकती ही रही इक अनकही—सी बात आँखों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुई हैं इनमें कितने ही मधुर सपनों की हत्याएँ&lt;br /&gt;है जीवन आज तक भी दर्द का आघात आँखों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारे प्यार का जोगी तो अब बन—बन भटकता है&lt;br /&gt;रमाए धूल यादों की लिए बारात आँखों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं ऐसा न हो ‘साग़र’! उसे भी रो के खो बैठो&lt;br /&gt;सुरक्षित है जो उजड़े प्यार की सौग़ात आँखों में.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१०.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर निगाहों में आ बसा कोई&lt;br /&gt;होने वाला है हादसा कोई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुमरही—सी है गुमरही यारो!&lt;br /&gt;कोई मंज़िल न रास्ता कोई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाने क्यों उस बड़ी हवेली से&lt;br /&gt;आज आती नहीं सदा कोई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर कोई अपने आप में गुम है&lt;br /&gt;अब कहे तो किसी से क्या कोई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इश्क़ वो दास्तान है जिसकी&lt;br /&gt;इब्तिदा है न इंतिहा कोई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वक़्त ने लम्हा—लम्हा लूटा जिसे&lt;br /&gt;ज़िन्दगी है या बेसवा कोई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुद्दई  हैं न दावेदार ही हम&lt;br /&gt;कोई दावा न मुद्दआ कोई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने तो सब की ख़ैर माँगी थी&lt;br /&gt;किसलिए हमसे हो ख़फ़ा कोई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर क़दम फूँक—फूँक रखते हैं&lt;br /&gt;हमको दे दे न बद्दुआ कोई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देस अपना ही हो गया परदेस &lt;br /&gt;कोई मैहरम न आशना कोई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात ‘साग़र’! ख़िज़ाँ की करते हो&lt;br /&gt;है बहारों का भी पता कोई ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;११.&lt;br /&gt;फिर तसव्वुर में वही नक़्श उभर आया है&lt;br /&gt;सुबह का भूला हुआ शाम को घर आया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जुस्तजू है मुझ अपनी तो उसे अपनी तलाश&lt;br /&gt;मेरा साया ही मुझे ग़ैर  नज़र आया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह मेरा हुस्न—ए—नज़र है के करिश्मा सका&lt;br /&gt;ज़र्रे—ज़र्रे में मुझे नूर  नज़र  आया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसकी लहरों पे थिरकता है तेरा अक़्स—ए—जमील&lt;br /&gt;वो जो दरया तेरे गाँओं से गुज़र आया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिज्र की रात! नया ढूँढ ले हमदम कोई&lt;br /&gt;मैं तो चलता हूँ मेरा वक़्त—ए—सफ़र आया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब हुई उनसे मुलाक़ात अचानक ’साग़र’!&lt;br /&gt;इक सितारा—सा नज़र वक़्त—ए—सहर आया है.&lt;br /&gt;( बीसवीं सदी )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१२.&lt;br /&gt;इरादे थे क्या और क्या कर चले&lt;br /&gt;कि खुद को ही खुद से जुदा कर चले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अदा यूँ वो रस्म—ए—वफ़ा कर चले&lt;br /&gt;क़दम सूए—मक़्तल उठा कर चले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये अहल—ए—सियासत का फ़र्मान है&lt;br /&gt;न कोई यहाँ सर उठा कर चले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उजाले से मानूस थे इस क़दर &lt;br /&gt;दीए आँधियों में जला कर चले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब उन के ख़ुद मंज़िलें आ गईं&lt;br /&gt;क़दम से क़दम जो मिला कर चले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्हें रहबरी का सलीक़ा न था&lt;br /&gt;सुपुर्द उनके ही क़ाफ़िला कर चले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी की निगाहों के इक जाम से&lt;br /&gt;इलाज—ए—ग़म—ए—नातवाँ कर चले&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग़ज़ल कह के हम हजरते मीर को&lt;br /&gt;ख़िराज़—ए—अक़ीदत अदा कर चले.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१३. &lt;br /&gt;काश वो इक पल ही आ जाते आस के सूने आँगन में&lt;br /&gt;रंग—बिरंगे फूल महकते सोच के सूने उपवन में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूनी धरती पर शायद फिर  आई है रुत फूलों की&lt;br /&gt;खेतों —खेतों सरसों फूली, सिम्बल फूले वन—वन में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धरी रही पूजा की थाली व्यर्थ मेरा श्रृंगार गया&lt;br /&gt;वे प्रीतम नहीं लौट के आए बिछुड़े थे जो सावन में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहनाई के स्वर हैं घायल गीतों में संगीत नहीं&lt;br /&gt;पहली—सी वह बात कहाँ है अब पायल की झन—झन में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सपनों के जो गाँव बसे थे आँख खुली तो उजड़ गए&lt;br /&gt;पिघल गए अंतर—ज्वाला से ढले बदन जो कंचन में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाने कितना और है बाक़ी जीवन का बनवास अभी&lt;br /&gt;मन का पंछी बँधता जाए मोह—माया के बंधन में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन के हर मोड़ पे कितनी साँसों का बलिदान हुआ&lt;br /&gt;जाने कितने सूरज डूबे सुख—दुख की इस उलझन में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुम—सुम—से हम दिल में इक तूफ़ान छुपाए बैठे थे&lt;br /&gt;उनसे नयन मिले तो कौंधी बिजली—सी इक तन—मन में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनसे कोई संबंध नहीं है फिर भी वे जब मिल जाएँ&lt;br /&gt;इक तेज़ी —सी आ जाती है `सागर’! दिल की धड़कन में.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3704081507814008687-3501956548631810950?l=dwijandghazal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dwijandghazal.blogspot.com/feeds/3501956548631810950/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3704081507814008687&amp;postID=3501956548631810950' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3704081507814008687/posts/default/3501956548631810950'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3704081507814008687/posts/default/3501956548631810950'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dwijandghazal.blogspot.com/2008/06/blog-post_25.html' title='साग़र साहेब की और ग़ज़लें'/><author><name>द्विजेन्द्र ‘द्विज’</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16379129109381376790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' 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&lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3704081507814008687-4929669673219852326?l=dwijandghazal.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://dwijandghazal.blogspot.com/feeds/4929669673219852326/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3704081507814008687&amp;postID=4929669673219852326' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3704081507814008687/posts/default/4929669673219852326'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3704081507814008687/posts/default/4929669673219852326'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://dwijandghazal.blogspot.com/2008/05/blog-post.html' title='कविता कोश पर मेरी ग़ज़लें...'/><author><name>द्विजेन्द्र ‘द्विज’</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16379129109381376790</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='21' src='http://bp0.blogger.com/_8Gu4F-EdIh0/SD119gdj7mI/AAAAAAAAAAU/cXxdkAh97pI/S220/Dwij.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_8Gu4F-EdIh0/SD5Cawdj7oI/AAAAAAAAAAg/WrCaVsAmpUE/s72-c/dwij+jii.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry></feed>
